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Uttar Vaidic Kaal (उत्तर वैदिक काल)

 उत्तर वैदिक काल (1000-600 ई.पू.)

      उत्तर वैदिक काल- भारतीय इतिहास में उस काल को, जिसमें सामवेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद तथा ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों एवं उपनिषद की रचना हुई, उत्तर वैदिक काल कहा जाता है। इस काल को अन्धविश्वाश और कर्मकाण्डों के उत्थान का काल माना जाता है।  इस काल के लोग मिट्टी के चित्रित और भूरे रंग के कटोरों तथा थालियों का प्रयोग करते थे। इसलिए इस काल को चित्रित धूसर मृद्भाण्ड संस्कृति भी कहा जाता है। वे लोहे के हथियारों का भी प्रयोग करते थे। पाकिस्तान के गांधार में 1000 ई.पू. के लोहे के उपकरण प्राप्त हुए हैं। वहाँ क़ब्र में मृतकों के साथ लोहे के उपकरण प्राप्त हुए हैं। 800 ई.पू. के आस-पास  इनका उपयोग गंगा - यमुना दोआब में होने लगा था। उत्तरी दोआब में चित्रित धूसर मृद्भाण्ड के 700 स्थल मिले हैं जिसमें निम्नलिखित चार स्थलों की खुदाई की गयी है-

  1.   अतरंजीखेड़ा
  2.   जखेड़ा
  3.   हस्तिनापुर
  4.   नोह

        अभी तक उत्खनन में केवल अतरंजीखेड़ा से ही लौह उपकरण के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। उत्तर वैदिक ग्रन्थों में लोहे के लिए लौह अयस एवं कृष्ण शब्द का प्रयोग किया गया है। अतरंजीखेड़ा में भी पहली बार कृषि से सम्बन्धित लौह उपकरण प्राप्त हुए हैं।

    उत्तर वैदिक काल में आर्यों ने गंगा, यमुना एवं सदानीरा (गण्डक) नदियों के मैदानों को जीतकर अपने अधिकार क्षेत्र में कर लिया। दक्षिण में आर्यों का फैलाव विदर्भ तक हुआ था। उत्तर वैदिककालीन सभ्यता का मुख्य केन्द्र 'मध्य प्रदेश' था, जिसका प्रसार सरस्वती से लेकर गंगा के दोआब तक था। यही पर कुरु एवं पांचाल जैसे विशाल राज्य थे। यहीं से आर्य संस्कृति पूर्वी ओर प्रस्थान कर कोशल, काशी एवं विदेह तक फैली थी। मणव एवं अंग प्रदेश आर्य सभ्यता के क्षेत्र के बाहर थे। मगध में निवास करने वाले लोगों को अथर्ववेद में 'व्रात्य' कहा गया है। ये प्राकृत भाषा बोलते थे।

        उत्तर वैदिक काल में पुरु और भरत कबीला मिलकर 'कुरु' कहलाए तथा 'तुर्वश' और 'क्रिवि' कबीला मिलकर 'पंचाल' (पांचाल) कहलाये। आरम्भ में कुरुओं की राजधानी असनदिवन्त में थी जिसके अन्तर्गत कुरुक्षेत्र (सरस्वती और दृषद्वती के बीच की भूमि) भी सम्मिलित था। शीघ्र ही कुरुओं ने दिल्ली एवं उत्तरी दोआब पर अधिकार कर लिया। अब उनकी राजधानी हस्तिनापुर हो गयी। बलिहव प्रतिपीय, राजा परीक्षित, जनमेजय आदि कुरु राजवंश के प्रमुख राजा थे। परीक्षित का नाम अथर्ववेद में भी मिलता है। जनमेजय के बारे में माना जाता है कि उसने सर्पसत्र एवं दो अश्वमेध यज्ञ कराये थे। कुरु वंश का अन्तिम शासक निचक्षु था। हस्तिनापुर बाढ़ में नष्ट हो गया था इसलिए जनमेजय अपनी राजधानी हस्तिनापुर से कौशाम्बी ले आया। पञ्चाल क्षेत्र के अंतर्गत आधुनिक बरेली, बदायूँ, एवं फ़र्रुख़ाबाद आता है। इनकी राजधानी काम्पिल्य थी। पञ्चालों के एक महत्त्वपूर्ण शासक प्रवाहण जैवलि थे, जो विद्धानों के संरक्षक थे। पञ्चाल दार्शनिक राजाओं के लिए भी जाना जाता था। आरुणि श्वेतकेतु पञ्चाल क्षेत्र के ही थे।

        उत्तरवैदिक कालीन सभ्यता का केन्द्र मध्य देश था। यह सरस्वती से गंगा के दोआब तक फैला हुआ था। इसके बाद आर्यों का विस्तार वरुणा-असी नदी तक हुआ और काशी राज्य की स्थापना हुई। शतपथ ब्राह्मण में यह उल्लेख मिलता है कि विदेधमाधव ने अपने गुरु राहुगण की सहायता से अग्नि के द्वारा इस क्षेत्र को साफ़ किया था। अजातशत्रु एक दार्शनिक राजा माना जाता था। वह बनारस से सम्बद्ध था। सिन्धु नदी के दोनों तटों पर गांधार जनपद था। गांधार और व्यास नदी के बीच कैकेय देश स्थित था। छान्दोग्य-उपनिषद के अनुसार उसने यह दावा किया था कि मेरे राज्य में चोर, मद्वसेवी, क्रियाहीन, व्यभिचारी और अविद्वान नहीं है।

      मद्र देश पंजाब में सियालकोट और उसके आस-पास स्थित था। मत्स्य राज्य के अन्तर्गत राजस्थान के जयपुर, अलवर, भरतपुर थे। आर्यों में विन्ध्याचल तक अपना विस्तार किया। गंगा-यमुना दोआब एवं उसके आस-पास का क्षेत्र ब्रह्मर्षि देश कहलाता था। हिमाचल और विन्ध्याचल का बीच का क्षेत्र मध्य देश कहलाता था। उपनिषद काल में विदेह ने पञ्चाल का स्थान ग्रहण कर लिया। विदेह के राजा जनक प्रसिद्ध दार्शनिक थे। दक्षिण में आर्यो का फैलाव विदर्भ तक हुआ। मगध और अंग प्रदेश आर्य क्षेत्र से बाहर थे। उत्तर वैदिक काल में ही पहली बार आन्ध्रों, बंगाल के पुंड़्रों, उड़ीसा और मध्य प्रान्त के शवरों तथा दक्षिण-पश्चिम के पुलिन्दों के नाम भी मिलते हैं। 


        राजनीतिक संगठन- उत्तर वैदिक काल में 'राजतंत्र' ही शासन तंत्र का आधार था, परन्तु कहीं-कहीं पर गणराज्यों के उदाहरण भी मिलते हैं। सर्वप्रथम ऐतरेय ब्राह्मण में ही 'राजत्व के दैवीय सिद्धांत' का वर्णन मिलता है। इस काल में राजा का अधिकार पूर्व वैदिक काल की अपेक्षा कुछ अधिक हो गया था। अब उसे बड़ी-बड़ी उपाधियां मिलने लगीं जैसे- अधिराज, राजाधिराज, सम्राट तथा  एकराट् आदि। ऐतरेय ब्राह्मण तथा शतपथ ब्राह्मण में ऐसी उपाधियाँ धारण करने वाले राजाओं की सूची मिलती है। ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार प्रात्य (पूर्व) का शासक सम्राट की उपाधि धारण करते थे, पश्चिम के स्वराट, उत्तर के विराट्, दक्षिण के भोज तथा मध्य देश के राजा होते थे। प्रदेश का संकेत करने वाला शब्द 'राष्ट्र' सर्वप्रथम उत्तर वैदिक काल में ही प्रयोग किया गया था। इस काल के प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि शायद राजा का चुनाव पहले जनता (विश) द्वारा एवं कालान्तर में जनता के प्रतिनिधियों द्वारा किया जाता था , अन्ततः उत्तर वैदिक काल में राजा का पद वंशानुगत हो गया।

        शतपथ ब्राह्मण में राजा के निर्वाचन की चर्चा की गयी है और ऐसे राजा को विशपति कहा जाता था। अत्याचारी शासक को जनता द्वारा पदच्युत भी किया जा सकता था। उदाहरण के लिए सृजंयों ने दुष्ट ऋतु से पौशायन को बाहर निकाल दिया था। ताण्ड्य ब्राह्मण में प्रजा के द्वारा राजा के विनाश के लिए एक विशेष यज्ञ किए जाने का भी उल्लेख मिलता है। वैराज्य का अर्थ उस राज्य से है जहाँ राजा नहीं होता था। शतपथ ब्राह्मण में उस राज्य के लिए राष्ट्री शब्द का प्रयोग किया गया है जो निरंकुशता पूर्वक जनता की सम्पत्ति का उपभोग करता था। अथर्ववेद मे राजा को विषमत्ता (जनता का भक्षक) कहा गया। अथर्ववेद में कहा गया है कि समुद्र पर्यन्त पृथ्वी का शासक एकराट होता है।

        अथर्ववेद के एक परिच्छेद में कहा गया है कि राजा राष्ट्र (क्षेत्र) का स्वामी होता है और राजा को वरुण, बृहस्पति, इन्द्र तथा अग्नि देवता दृढ़ता प्रदान करते हैं। राजा के राज्याभिषेक के समय 'राजसूय यज्ञ' का अनुष्ठान किया जाता था। जिसमें राजा द्वारा राज्य के 'रत्नियों' को हवि (हवि से मतलब है कि राज्य प्रत्येक रत्नी के घर जाकर उनका समर्थन एवं सहयोग प्राप्त करता था) प्रदान की जाती थी। राजसूय यज्ञ का वर्णन शतपथ ब्राह्मण में मिलता है। यह दो दिन तक चलता था। राजसूय यज्ञ में वरुण देवता पार्थिव शरीर में प्रकट होते थे। राजसूय यज्ञ के अनुष्ठान से यह समझा जाता था कि राजा को दिव्य शक्ति प्राप्त हो गयी है। राजसूय यज्ञ कराने वाले पुरोहिताध्यक्ष को दक्षिणा के रूप में 240,000 गायें दी जाती थी।

        राजा की शक्ति में अभिवृद्वय के लिए अश्वमेध और वाजपेय यज्ञों का भी विधान किया गया था। अश्वमेध यज्ञ से यह समझा जाता था कि राजा द्वारा इस यज्ञ में छोड़ा गया घोड़ा जिन-जिन क्षेत्रों से बेरोक गुजरेगा, उन सभी क्षेत्रों पर राजा का एक छत्र अधिपत्य हो जायेगा। शतपथ ब्राह्मण में भरतों के दो राजाओं भरत दौषयन्ति और शतानिक सत्राजित द्वारा अश्वमेध यज्ञ कराने का उल्लेख मिलता है। वाजपेय यज्ञ शक्ति प्राप्त करने वाला एक सोम यज्ञ था जो साल में 17 दिन तक चलता था। वाजपेय (रथदौड़) यज्ञ में राजा का रथ अन्य सभी बन्धुओं के रथों से आगे निकल जाता था।

        इन सभी अनुष्ठानों से प्रजा के चित्त पर राजा की बढ़ती शक्ति और महिमा की गहरी छाप पड़ती थी। गोपथ ब्राह्मण के अनुसार राजा को राजसूय यज्ञ, सम्राट को वाजपेय, स्वराट को अश्वमेध, विराट को पुरुषमेघ और सर्वराट को सर्वमेघ करना चाहिए। किन्तु आपस्तम्भ श्रोत सूत्र के अनुसार अश्वमेध यज्ञ केवल सर्वभौम ही कर सकता है।

      शतपथ ब्राह्मण में 13 रत्नियों का उल्लेख किया गया है-

  1.   ब्राह्मण (पुरोहित)
  2.   राजन्य
  3.   बवाता (प्रियरानी)
  4.   परिवृत्ती (राजा की उपेक्षित प्रथम पत्नी)
  5.   सेनानी (सेना का नायक)
  6.   सूत (सारथी)
  7.   ग्रामणी (ग्राम प्रधान)
  8.   क्षतृ (कोषाधिकारी)
  9.   संगहीत्ट (सारथी या कोषाध्यक्ष)
  10.   भागदुध (कर संग्रहकर्ता)
  11.   अक्षवाप (पासा फेंकने वाला/ पासे के खेल में राजा का सहयोगी)
  12.   गोविकर्तन (आखेटक)
  13.   पालागल (सन्देशवाहक)

        उत्तर वैदिक काल में राजा का राज्याभिषेक पुरोहित द्वारा एक 100 छिद्र वाले स्वर्ण पात्र से किया जाता था। राजा के राज्याभिषेक में 17 प्रकार के जल का प्रयोग किया जाता था। करों की नियमित व्यवस्था का उल्लेख सर्वप्रथम उत्तर वैदिक काल में ही मिलता है। उत्तर वैदिक काल में भी पूर्व वैदिक काल की भांति राजा कोई नियमित सेना नहीं रखता था। युद्ध के समय कबीले के जवान लोगों के दलों को भर्ती कर लिया जाता था तथा कर्मकाण्ड के एक अनुष्ठान के अनुसार युद्ध में विजय पाने की कामना से राजा को एक ही थाली में अपनी प्रजा के साथ भोजन करना पड़ता था।


      सामाजिक जीवन- उत्तर वैदिक काल में धीरे-धीरे छोटे गांव बड़े गांव में तथा बड़े गांव नगरों के रूप में विकसित होने लगे थे,जिसका उल्लेख जैमिनीय उपनिषद एवं तैत्तरीय ब्राह्मण में महाग्रामों एवं नागरिन के रूप में मिलता है। उत्तर वैदिक काल में मकानों का निर्माण कच्ची एवं पक्की ईटों, मिट्टी, बांस तथा लकड़ी से किया जाता था। घर में अग्निशाला, पशुशाला एवं अतिथिशाला का भी निर्माण किया जाता था। 'कुल' का उल्लेख सर्वप्रथम उत्तर वैदिक काल में ही मिलता है। उत्तर वैदिक कालीन समाज पितृसत्तात्मक था। समाज में संयुक्त परिवार प्रथा प्रचलित थी। परिवार का मुखिया 'कुलप' कहलाता था। परिवार कुल कहलाता था। कई कुल मिलकर ग्राम, कई ग्राम मिलकर विश, कई विश मिलकर जन एवं कई जन मिलकर जनपद बनते थे। अतिथि सत्कार की परम्परा का सर्वाधिक महत्व था। एक वर्ग ' पणियों ' का था जो धनि थे और व्यापार करते थे। इस काल में भिखारियों और कृषि दासों का अस्तित्व नहीं था। संपत्ति की इकाई गाय (गौ ) थी जो विनिमय का माध्यम भी थी।

    इस काल में सारथी और बढई समुदाय को विशेष सम्मान प्रदान किया जाता था। अस्पृश्यता, सती प्रथा, परदा प्रथा, बाल विवाह आदि का प्रचलन नहीं था। महिलाओं को शिक्षा का अधिकार प्राप्त था तथा उन्हें वर चुनने की आजादी दी गयी थी। महिलाओं का उपनयन संस्कार, विधवा विवाह, नियोग प्रथा, गन्धर्व विवाह एवं अंतर्जातीय विवाह प्रचलित था। वस्त्राभूषण स्त्री एवं पुरूष दोनों को प्रिय थे। शाकाहार का प्रचलन था तथा जौ (यव) इस काल का मुख्य अनाज था। सोम रस (अम्रित जैसा) का प्रचलन था। नृत्य, संगीत, पासा, घुड़दौड़, मल्लयुद्ध, शुइकर आदि मनोरंजन के प्रमुख साधन थे। अपाला, घोषा, मैत्रयी, विश्ववारा, गार्गी आदि विदुषी महिलाएं थीं। ऋग्वेद में अनार्यों (मुर्ख या दस्यु) को मृद्धवाय (अस्पष्ट बोलने वाला), अवृत (नियमों- व्रतों का पालन नहीं करने वाला), बताया गया है।


       वर्ण व्यवस्था- पूर्व वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था पूर्ण रूप से विकसित नहीं  हुई थी। उत्तर वैदिक काल तक समाज स्पष्ट रूप से चार वर्णों में विभाजित हो चुका था। इस काल में वर्ण व्यवस्था का आधार कर्म पर आधारित न रहकर जाति पर आधारित हो गया था। जिस प्रकार मनुष्य के जीवन को चार विभागों (आश्रमों) में विभक्त किया गया है, वैसे ही मानव-समाज भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र — इन चार वर्णों में विभक्त था।

    
    सर्वप्रथम चरों वर्णों के कर्मों के विषय में विवरण 'ऐतरेय ब्राह्मण' से प्राप्त होता है। समाज में सबसे ऊँचा स्थान ब्राह्मणों का है, जो त्याग और अकिंचनता को ही अपनी सम्पत्ति मानते हैं। क्षत्रिय लोग सांसारिक सुखों का उपभोग अवश्य करते हैं, पर उनका कार्य धनोपार्जन करना न होकर जनता की ब्राह्य और आभ्यन्तर विपित्तियों से रक्षा करना है। समाज में  ब्राह्मणों और क्षत्रियों का स्थान वैश्यों की अपेक्षा ऊँचा है, क्योंकि मानव-जीवन का ध्येय धन-सम्पत्ति की अपेक्षा अधिक उच्च है। वैश्यों को कृषि, पशुपालन और वाणिज्य द्वारा समाज की भौतिक आवश्यकताओं को पूर्ण करना है, और शूद्र का कार्य अन्य वर्णों की सेवा द्वारा अपनी आजीविका कमाना है। जिस प्रकार मानव-जीवन तभी पूर्ण हो सकता है, जबकि उसमें भौतिक उन्नति के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति को भी स्थान प्राप्त हो, उसी प्रकार मानव समाज की पूर्णता के लिये भी यह आवश्यक है, कि उसके विविध वर्ग भौतिक सुखों व साधनों के साथ-साथ परोपकार व अध्यात्म-सुख के लिए भी प्रयत्नशील हों। इस काल में भी जाति प्रथा इतनी कठोर नहीं थी जितनी कि सूत्रों के काल में थी। ब्राह्मण के लिए एहि , क्षत्रिय के लिए आगच्छ, वैश्य के लिए आद्रव तथा शूद्र के लिए आघव शब्द का प्रयोग किया जाता था। शतपथ ब्राह्मण में चारों वर्णों की अन्त्येष्टि के लिए भी चार प्रकार के चिता स्तूपों का उल्लेख मिलता है।

        उत्तर वैदिक काल तक अस्पृश्यता की भावना का उदय नहीं हुआ था। उपनिषदों में उल्लेखित सत्यकाम जाबालि तथा जनश्रुति की कथाओं से स्पष्ट होता है कि शूद्र भी दर्शन के अध्ययन से वंचित नहीं थे। वृहदारण्यक तथा छान्दोग्य उपनिषदों में कहा गया है कि ब्रह्मलोक में सभी सामान हैं। अतः चाण्डाल भी यज्ञ का अवशेष पाने का अधिकारी है। शतपथ ब्राह्मण में शूद्रों के सोमयज्ञ में भाग लेने की बात कही गयी है। उत्तर वैदिक काल में शूद्रों को यज्ञोपवीत संस्कार का अधिकार नहीं था।

      ब्राह्मणों को 'अदायी' दान लेने वाला, सोमपायी तथा स्वेच्छा से भ्रमणशील कहा गया है। ब्राह्मण सोम को अपना राजा मानते थे। क्षत्रिय अथवा राजा भूमि का मालिक, प्रजा का सेवक और देश का रक्षक होता था। मैत्रायणी संहिता में धनी शूद्रों का भी वर्णन मिलता है। इन्हें उपनयन संस्कार का अधिकार प्राप्त था। बच्चे, विधवा स्त्री तथा सन्यासी वर्ण व्यवस्था से बहार थे। शिल्पियों में संभवतः 'रथकार' को यज्ञोपवीत संस्कार का अधिकार प्राप्त था। उत्तर वैदिक  काल में जाति परिवर्तन करना कठिन हो गया था।

        सर्वप्रथम 'गोत्र व्यवस्था' उत्तर वैदिक काल में ही प्रचलन में आयी थी। इस काल में एक ही गोत्र के लोगों के परस्पर विवाह पर प्रतिबन्ध लग गया था। कुल के अर्थ में गोत्र का सर्वप्रथम प्रयोग अथर्ववेद में प्राप्त होता है।


       आश्रम व्यवस्था- भारतीय समाज में आश्रम व्यवस्था का विधान मानव जीवन को सुव्यवस्थित एवं सुसंस्कृत बनाने के लिए किया गया था। आश्रम शब्द की उत्पत्ति 'श्रम' धातु से हुई है जिसका अर्थ है परिश्रम करना अथवा प्रयास करना। सर्वप्रथम जावालोपनिषद में चारों आश्रमों क्रमशः ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास आश्रम का विवरण विवरण मिलता है। उत्तर वैदिक काल में ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ आश्रम का ही स्पष्ट उल्लेख किया गया है, संन्यास आश्रम विशेष महत्व नहीं पा सका था। 

  1.    ब्रह्मचर्य आश्रम- बालकों को अपनी शिक्षा ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए ही पूरी करनी होती थी। बालकों के गुरुकुल में प्रवेश के लिए उपनयन संस्कार का पालन किया जाता था। अश्वलायन सूत्र के अनुसार उपनयन संस्कार की आयु ब्राह्मण के लिए 8 वर्ष, क्षत्रिय के लिए 11 वर्ष तथा वैश्य के लिए 12 वर्ष होती थी।
  2.    गृहस्थ आश्रम- बालकों की शिक्षा पूर्ण होने पर समावर्तन संस्कार का पालन किया जाता था। समावर्तन संस्कार के बाद बालक गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता था। उसके पश्चात पंच महायज्ञ, हवियज्ञ एवं सोमयज्ञ को पूरा किया जाता था।  शूद्रों के लिए केवल गृहस्थ आश्रम का ही विधान था। सभी आश्रमों  गृहस्थ आश्रम सबसे महत्वपूर्ण था।
  3.   वानप्रस्थ आश्रम- इस आश्रम में आर्य अपनी बस्ती तथा सगे सम्बन्धियों से दूर रहकर चिंतन तथा मनन किया करता था। आरण्यक ग्रंथों की रचना वानप्रस्थ आश्रम के संन्यासियों के द्वारा ही की गयी थी।
  4.    संन्यास आश्रम- आश्रम व्यवस्था का यह सबसे अंतिम आश्रम है। इस आश्रम में व्यक्ति जीवन की सभी सक्रिय गतिविधियों से दूर रहता था तथा अपनी मनः स्थिति को तैयार करता था।

 
    आर्थिक जीवन- कृषि के अधिकाधिक प्रसार के परिणामस्वरूप उत्तर वैदिक कालीन लोगों के आर्थिक जीवन में सर्वाधिक महात्वपूर्ण परिवर्तन उनके स्थायित्व में दृष्टिगोचर होता है। इस काल में अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार पशुपालन एवं कृषि था। अथर्ववेद के अनुसार सर्वप्रथम पृथुवैन्य ने हल एवं कृषि को जन्म दिया था। दो प्रहार के धान ब्रीहि एवं तंदुल तथा ईंख का उल्लेख सर्वप्रथम अथर्ववेद में ही मिला है। अथर्ववेद में ही सिंचाई के साधन के रूप में वर्ष, कूप और नहर का उल्लेख किया गया है। सर्वप्रथम शतपथ ब्राह्मण में कृषि की समस्त प्रकृतियों यथा- कृष्ण (जुताई), बापन (बुआई), लुनन (कटाई) एवं मृणन (मड़ाई) का उल्लेख किया गया है। शतपथ ब्राह्मण में ही कृषि से सम्बंधित अनुष्ठानों की चर्चा की गयी है। राजा जनक स्वयं हल चलते थे। बलराम हलधर कहलाते थे। छान्दोग्य उपनिषद में दुर्भिक्ष एवं अकाल का उल्लेख मिलता है। उत्तर वैदिक काल में भूमि अनुदान की चर्चा नहीं मिलती है।  यजुर्वेद में चावल की पांच किस्मों -महाब्रीहि, कृष्णब्रीहि, शुक्लब्रीहि, आशुधान्य एवं हायन का उल्लेख किया गया है।

     इस काल में ज्यादा पालतु पशु रखने वाले गोमत कहलाते थे। चारागाह के लिए ' उत्यति ' या ' गव्य ' शब्द का प्रयोग किया जाता था। दूरी को ' गवयुती', पुत्री को दुहिता (गाय दुहने वाली) तथा युद्धों के लिए ' गविष्टि ' शब्द का प्रयोग किया गया था। राजा को जनता स्वेच्छा से कर देती थी। आवास घास-फूस एवं काष्ठ निर्मित होते थे। ऋण लेने एवं देने की प्रथा प्रचलित थी जिसे ' कुसीद ' कहा जाता था। बैलगाड़ी, रथ एवं नाव को यातायात के प्रमुख साधनों के रूप में प्रयोग किया जाता था।

        पशुपालन- अथर्ववेद में एक गाय, बैल तथा घोड़े की प्राप्ति के लिए इन्द्र से प्रार्थना की गयी है। शतपथ ब्राह्मण में इस विषय में स्पष्ट उल्लेख है कि गाय और बैल पृथ्वी को धारण करते हैं। ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार दो गधे अश्विन देवताओं के रथ खींचते थे। शतपथ ब्राह्मण में शूकर की चर्चा की गयी है।इस काल के मुख्य पालतू पशु गाय, बैल, हाथी, घोडा, भैंस, गधा, भेड़, बकरी, ऊंट तथा शूकर आदि थे। इनमें से भी सबसे प्रमुख पशु गाय थी, जिसे अघन्या (जिसका वध नहीं किया जा सकता) कहा जाता था। उत्तर वैदिक काल में बड़े बैल को महोक्ष कहा जाता था।

    व्यापार- मुद्रा प्रणाली का विकास न होने के कारण पूर्व वैदिक काल की भाँति इस काल का व्यापार भी वस्तु विनिमय पर ही आधारित था। राजा को बलि, शुल्क तथा भाग आदि वस्तुओं के रूप में ही दिए जाते थे। व्यापार 'प्रपण' द्वारा संपन्न होता था जिसमें लेन-देन का माध्यम गाय तथा निष्क को बनाया जाता था।
    उत्तर वैदिक काल में तौल के रूप में शतमान, कृष्णल तथा पाद आदि का वर्णन मिलता है। निष्क जो वैदिक काल में गले का एक आभूषण था, अब वह सोने का एक ढेला हो गया था, जिसकी जिश्चित तौल 320 रत्तिओं के बराबर थी। कृष्णल 1 रत्ती या 1.8 ग्रेन का होता था। शतपथ ब्राह्मण में पहली बार सूदखोरी एवं महारानी शब्द की चर्चा भी की गयी है। महाजन को सीर्दन कहा गया था।

      उद्योग- वाजसनेयी संहिता एवं तैत्तरीय उपनिषद में इस काल के प्रमुख व्यवसायी- धातुकर्मी, मछुआरे, धोबी, कुलाल, रथकार तथा चिकित्सक आदि का उल्लेख मिलता है। उत्तर वैदिक काल में विविध प्रकार के शिल्पों का भी उदय हुआ था। इस काल में उद्योगों में विशेषज्ञता बहुत ऊँचे स्तर पर पहुँच गयी थी। रथ बनाने वाला बढ़ई से, धनुष बनाने वाला धनुष की डोरी और तीर बनाने वालों से अलग पहचान रखता था। यजुर्वेद में व्यवसायों तथा पेशों की सूची मिलती है। व्यवसायी श्रेणियों में संगठित थे। स्त्रियां भी उद्योगों में सहयोग किया करती थीं।

     धार्मिक जीवन- वैदिक साहित्य प्रधानतया धर्मपरक साहित्य है। अत: इस युग के धार्मिक विश्वासों के सम्बन्ध में उनसे अधिक विशद रूप में परिचय प्राप्त होता है। इस काल के आर्य विविध देवी देवताओं की पूजा करते थे। इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि, यम आदि ऐसे अनेक देवता थे, जिन्हें तृप्त व सन्तुष्ट करने के लिए उत्तर वैदिक कालीन आर्य अनेक विविध-विधानों का अनुसरण करते थे। संसार का स्रष्टा, पालक व संहर्ता, एक ईश्वर की कल्पना सम्भवत: बाद में विकसित हुई, और प्रारम्भ में आर्य लोग प्रकृति की विविध शक्तियों को देवता के रूप में मान कर उन्हीं की उपासना करते थे। प्रकृति में हम अनेक शक्तियों को देखते हैं। वर्षा, धूप, सरदी, गरमी सब एक नियम से होती हैं। इन प्राकृतिक शक्तियों के कोई अधिष्ठातृ-देवता भी होने चाहिये, और इन देवताओं की पूजा द्वारा मनुष्य अपनी सुख-समृद्धि में वृद्धि कर सकता है, यह विचार प्राचीन आर्यों में विद्यमान था।

    उत्तर वैदिक कालीन धर्म की प्रमुख विशेषता यज्ञों की जटिलता एवं कर्मकाण्डों की दुरूहता थी। विविध देवताओं की पूजा के लिये वैदिक आर्य अनेक विध यज्ञों का अनुष्ठान करते थे। यज्ञों में शुद्ध मंत्रोच्चारण पर विशेष बल दिया जाता था। यज्ञकुण्ड में अग्नि का आवाहन कर दूध, घी, अन्न, सोम आदि सामग्री की आहुति दी जाती थी। यह समझा जाता था कि अग्नि में दी हुई आहुति देवताओं तक पहुँच जाती है, और अग्नि इस आहुति के लिये वाहन का कार्य करती है तथा सम्यकरूपेण यज्ञ संपन्न होने पर देवता विहित फल देने के लिए बाध्य होते हैं। वैदिक काल में यज्ञों में मांस की आहुति दी जाती थी या नहीं, इस सम्बन्ध में मतभेद हैं। महाभारत में संकलित एक प्राचीन अनुश्रुति के अनुसार पहले यज्ञों में पशुबली दी जाती थी। बाद में राजा वसु चैद्योपरिचर के समय में इस प्रथा के विरुद्ध आन्दोलन प्रबल हुआ। इस बात में तो सन्देह की कोई गुंजाइश नहीं है, कि बौद्ध-काल से पूर्व भारत में एक ऐसा समय अवश्य था, जब यज्ञों में पशुहिंसा का रिवाज था पर वेदों के समय में भी यह प्रथा विद्यमान थी, यह बात संदिग्ध है। वेदों में स्थान-स्थान पर घृत, अन्न व सोम द्वारा यज्ञों में आहुति देने का उल्लेख है, पर अश्व, अजा आदि पशुओं की बलि का स्पष्ट वर्णन वैदिक संहिताओं में नहीं मिलता है।

    याज्ञिक कर्मकाण्ड के अतिरिक्त स्तुति और प्रार्थना भी देवताओं की पूजा के महत्त्वपूर्ण साधन थे। वेदों के बहुत से सूक्तों व ऋचाओं में विभिन्न देवताओं की स्तुति ही की गई है। ऋग्वेद के देवताओं में इन्द्र का स्थान सर्वोपरि था।  उसकी स्तुति में कही गई ऋचाओं की संख्या 250 के लगभग है।

    
    यज्ञों का रूप प्रारम्भ में बहुत सरल था। यज्ञकुण्ड में अग्नि का आवाहन कर उसमें आहुतियाँ दी जाती थीं, जिनके द्वारा देवताओं को तृप्त किया जाता था। परन्तु धीरे-धीरे यज्ञों का रूप बहुत जटिल होता गया। उत्तर-वैदिक काल में यज्ञों की जटिलता चरम सीमा को पहुँच गयी थी। यज्ञ के लिये वेदों की रचना किस प्रकार की जाए, वेदों में अग्नि कैसे प्रज्वलित की जाए, किस ढंग से आहुतियाँ दी जाएँ, यज्ञ करते हुए यजमान अध्वर्यु ऋत्विक आदि कहाँ और किस प्रकार बैठें, वे अपने अंगों को किस ढंग से उठाएँ, किस प्रकार मन्त्रोच्चार करें, कैसे ज्ञात हो कि अब देवता यज्ञ की आहुति को ग्रहण करने के लिए पधार गये हैं, किन पदार्थों की आहुति दी जाय—इस प्रकार के विविध विषयों का ब्राह्मण ग्रंथों में बड़े विस्तार के साथ विवेचन किया गया है। किस याज्ञिक विधि का क्या प्रयोजन है, यह भी उनमें विशद रूप से वर्णित है। यज्ञों की अधिकता के कारण यज्ञों में विशेष रूप से दक्षता प्राप्त पुरोहितों का उदय हुआ। ऋग्वैदिक 7 पुरोहितों के स्थान पर उत्तर वैदिक काल में 14 पुरोहितों का उल्लेख मिलता है।

    मुख्यतः 4 प्रकार के पुरोहित होते थे -
  1.    होता- मुख्यतः प्रार्थना कराने वाले इन पुरोहितों ने 'ऋक संहिता' का पुनसृर्जन  किया था।
  2.   उदगाता- सामवेद का गायन करने वाले पुरोहितों को को उदगाता कहा जाता था।
  3.    अध्वर्यु- यह यजुर्वेद संहिता का मंत्रोच्चार करने वाला पुरोहित था।
  4.    ब्रह्मा- इस वर्ग के पुरोहित इस बात की जाँच किया करते थे कि यज्ञ विधि पूर्वक किया जा रहा है कि नहीं।
         जन्म से मृत्यु-पर्यन्त प्रत्येक गृहस्थ को अनेक प्रकार के यज्ञ करने होते थे। मनुष्य के वयक्तिगत जीवन के साथ सम्बन्ध रखने वाले संस्कारों का स्वरूप भी यज्ञ का ही था।

    गृहस्थ आर्यों को पांच महायज्ञों का अनुष्ठान करना पड़ता था -
  1.     ब्रह्मयज्ञ- प्राचीन ऋषियों के प्रति कृतज्ञता।
  2.     देवयज्ञ- देवताओं के प्रति कृतज्ञता।
  3.     पितृयज्ञ- पितरों का वर्णन।
  4.     मनुष्य यज्ञ- अतिथि सत्कार।
  5.     भूतयज्ञ या बलि- समस्त जीवों के प्रति कृतज्ञता।
    

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